शिमला 31 अक्तूबर, 2026

राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और इसकी सभ्यता, संस्कृति और समृद्ध ज्ञान परंपराओं का मूल आधार है।
राज्यपाल आज कांगड़ा जिले के नूरपुर के निकट मल्कवाल स्थित के.बी.वी.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय संस्कृत भारती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर राज्यपाल ने संगोष्ठी का विधिवत शुभारंभ किया तथा संस्कृत भारती, आयोजनकर्ताओं और देशभर से आए प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों ने हजारों वर्षों से भारत की ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की परंपराओं को संरक्षित एवं समृद्ध किया है। उन्होंने संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने तथा इसे दैनिक संवाद की भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने के लिए संस्कृत भारती द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की।
सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि देश की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने अपने निर्णायक नेतृत्व से लगभग 562 रियासतों का भारतीय संघ में विलय करवाकर राष्ट्र की एकता को मजबूत किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रतिभागियों को राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलाई गई।
राज्यपाल ने कहा कि भारत के इतिहास और शिक्षा व्यवस्था में आर्यभट्ट, पाणिनि, सुश्रुत और भास्कराचार्य जैसे प्राचीन भारतीय विद्वानों एवं वैज्ञानिकों के योगदान के साथ-साथ तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों को भी उचित स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। मातृभाषाओं के संरक्षण पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि भाषाओं के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उनका दैनिक जीवन में, विशेषकर परिवारों के बीच, नियमित उपयोग आवश्यक है।
उन्होंने हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक एवं भाषाई विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां की स्थानीय बोलियों पर संस्कृत का गहरा प्रभाव रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2019 से हिमाचल प्रदेश को देश के दूसरे संस्कृत भाषी राज्य का दर्जा प्राप्त है।
राज्यपाल ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल माध्यमों और वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ने का आह्वान किया, ताकि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में योगदान दिया जा सके। उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और अन्य विषयों से संबंधित बहुमूल्य ज्ञान का गहन एवं प्रमाणिक अनुसंधान किया जाना चाहिए तथा इसे वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से संस्कृत अध्ययन, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा, युवाओं को संस्कृत को केवल परीक्षा के एक विषय के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग और ज्ञान का अमूल्य भंडार मानकर अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की पूरक हैं तथा राष्ट्रीय प्रगति के लिए दोनों का सामंजस्यपूर्ण समन्वय आवश्यक है।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने संगोष्ठी को भारत की विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण बताया।
इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष रमेश कुमार पांडेय, अखिल भारतीय महामंत्री सत्यनारायण भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा, पूर्व मंत्री एवं स्वागत समिति के अध्यक्ष राकेश पठानिया, भटियात के पूर्व विधायक विक्रम जरियाल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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