जब एक देश अपना भूगोल खोने लगे, तब संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के भविष्य का होता है , मानचित्र पर तुवालु को ढूँढना आसान नहीं है। प्रशांत महासागर के विस्तृत नीले विस्तार में बिखरे नौ छोटे-छोटे कोरल द्वीपों का यह देश क्षेत्रफल और जनसंख्या—दोनों दृष्टियों से विश्व के सबसे छोटे राष्ट्रों में गिना जाता है। लगभग 10,000 नागरिकों वाला यह द्वीपीय राष्ट्र आज उस वैश्विक संकट का सबसे मार्मिक चेहरा बन चुका है, जिसे वर्षों तक केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की बहस समझा जाता रहा—जलवायु परिवर्तन। तुवालु का अपराध केवल इतना है कि वह समुद्र तल से औसतन दो मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। उसका दुर्भाग्य यह है कि उसने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग कोई योगदान नहीं दिया, फिर भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत वही चुका रहा है। यह विडंबना आधुनिक विकास मॉडल की सबसे बड़ी नैतिक विफलता है। आज तुवालु की धरती धीरे-धीरे समुद्र में समा रही है। बढ़ता समुद्री जलस्तर तटीय क्षेत्रों को काट रहा है, खारा पानी भूजल स्रोतों में प्रवेश कर चुका है, कृषि भूमि अनुपजाऊ होती जा रही है और हर वर्ष समुद्री तूफानों की तीव्रता बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि वर्तमान गति से जारी रही, तो इस शताब्दी के अंत तक तुवालु की राजधानी फुनाफूटी का अधिकांश भाग सामान्य उच्च ज्वार के समय ही जलमग्न हो सकता है। यह केवल भूमि के डूबने का प्रश्न नहीं है; यह एक राष्ट्र की संप्रभुता, संस्कृति, भाषा, इतिहास और सामूहिक स्मृति के विलुप्त होने का संकट है। इतिहास में अनेक सभ्यताएँ युद्ध, महामारी या आर्थिक पतन से समाप्त हुई हैं, किंतु पहली बार मानव इतिहास ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ पूरा का पूरा देश जलवायु परिवर्तन के कारण मानचित्र से गायब हो सकता है। इसी पृष्ठभूमि में ऑस्ट्रेलिया द्वारा घोषित “क्लाइमेट वीज़ा” योजना वैश्विक राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ का संकेत देती है। फालेपिली यूनियन संधि के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष 280 तुवालु नागरिकों को ऑस्ट्रेलिया में स्थायी निवास, रोजगार और शिक्षा के अवसर प्राप्त होंगे। यह विश्व की पहली ऐसी औपचारिक नीति है जिसने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संभावित विस्थापन को कानूनी और मानवीय आधार पर स्वीकार किया है। यह नीति केवल वीज़ा व्यवस्था नहीं है; यह स्वीकारोक्ति है कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन सीमाओं, नागरिकता और प्रवासन की पारंपरिक अवधारणाओं को बदल देगा। संयुक्त राष्ट्र पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ, तो आने वाले दशकों में करोड़ों लोग समुद्र के बढ़ते जलस्तर, भीषण सूखे, बाढ़ और चरम मौसमी घटनाओं के कारण विस्थापित हो सकते हैं। फिर भी यह पहल अपने आप में पर्याप्त नहीं है। यदि प्रतिवर्ष केवल 280 लोगों का पुनर्वास होगा, तो तुवालु की संपूर्ण आबादी को सुरक्षित स्थानांतरित करने में लगभग चार दशक लग जाएंगे। प्रश्न यह भी है कि क्या केवल लोगों को स्थानांतरित कर देना किसी राष्ट्र को बचा लेना कहलाएगा? क्या नागरिकों के विस्थापित हो जाने के बाद भी कोई राष्ट्र अपनी पहचान, संस्कृति, परंपरा और आत्मा को जीवित रख सकता है? यहीं से जलवायु परिवर्तन का प्रश्न केवल पर्यावरणीय न रहकर मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक न्याय का प्रश्न बन जाता है। तुवालु ने स्वयं को केवल पीड़ित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उसने पूरी दुनिया को झकझोरने का प्रयास भी किया। पूर्व विदेश मंत्री साइमन कोफे का समुद्र के भीतर खड़े होकर दिया गया भाषण इतिहास के सबसे प्रभावशाली जलवायु संदेशों में गिना जाता है। वह दृश्य केवल एक राजनेता का संबोधन नहीं था; वह पूरी मानवता के लिए यह संदेश था कि यदि आज भी दुनिया नहीं जागी, तो कल अनेक देशों की संसदें भी समुद्र के किनारे नहीं, बल्कि समुद्र के भीतर खड़ी दिखाई देंगी। तुवालु ने वैश्विक फॉसिल फ्यूल नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी की मांग भी उठाई है। इसका मूल विचार अत्यंत स्पष्ट है—यदि पृथ्वी को बचाना है, तो केवल उत्सर्जन घटाने के वादे पर्याप्त नहीं होंगे; नए कोयला, तेल और गैस परियोजनाओं पर भी रोक लगानी होगी। यह मांग उस विकास मॉडल को चुनौती देती है जिसने आर्थिक प्रगति को कार्बन आधारित ऊर्जा पर निर्भर बना दिया। यहाँ एक गंभीर नैतिक प्रश्न भी उठता है। जिन विकसित देशों ने औद्योगिक क्रांति से लेकर आज तक सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया, क्या उनकी जिम्मेदारी केवल आर्थिक सहायता देने तक सीमित है? या उन्हें जलवायु न्याय के सिद्धांत के अनुरूप अधिक उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए? यह बहस आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्रीय विषय बनने वाली है। भारत के लिए भी तुवालु का संकट किसी दूरस्थ द्वीप की कहानी नहीं है। भारत की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर करोड़ों लोग निवास करते हैं। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, विशाखापत्तनम, कोच्चि, पुरी और कांडला जैसे तटीय शहर पहले से ही समुद्र के बढ़ते जलस्तर, चक्रवातों और तटीय क्षरण की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों तथा अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने संकेत दिया है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति नहीं रुकी, तो भारत के अनेक तटीय क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर आंतरिक विस्थापन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए जलवायु परिवर्तन को अब केवल पर्यावरण मंत्रालय का विषय मानना भूल होगी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, आर्थिक विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और विदेश नीति—सभी का साझा प्रश्न बन चुका है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, मिशन लाइफ (Lifestyle for Environment), हरित ऊर्जा विस्तार और नेट-ज़ीरो लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। किंतु वैश्विक स्तर पर तब तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे, जब तक विकसित और विकासशील देश समान प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व के साथ आगे नहीं बढ़ते। तुवालु की कहानी कल पूरी दुनिया की कहानी हो सकती है तुवालु आज केवल एक छोटा द्वीपीय राष्ट्र नहीं है; वह मानव सभ्यता के भविष्य का दर्पण है। उसकी डूबती हुई धरती हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति की सीमाओं की अनदेखी कर किया गया विकास अंततः स्वयं मानव अस्तित्व को चुनौती देता है। ऑस्ट्रेलिया का क्लाइमेट वीज़ा मानवीय संवेदनशीलता का स्वागत योग्य कदम है, लेकिन यह समाधान का अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि शुरुआत है। वास्तविक समाधान उस दिन होगा जब दुनिया जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करेगी, कार्बन उत्सर्जन में निर्णायक कटौती करेगी, जलवायु वित्त को न्यायसंगत बनाएगी और विकास के नए, टिकाऊ मॉडल को अपनाएगी। आज तुवालु समुद्र से लड़ रहा है; कल यही संघर्ष दुनिया के अनेक तटीय देशों का हो सकता है। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि “तुवालु बचेगा या नहीं?” बल्कि यह है कि “क्या मानवता अपनी पृथ्वी को बचाने के लिए समय रहते बदलने का साहस दिखाएगी?” यदि इस प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की पुस्तकों में तुवालु को एक देश के रूप में नहीं, बल्कि मानव उदासीनता के सबसे बड़े स्मारक के रूप में पढ़ेंगी। लेखक: राजन कुमार शर्मा
गांव डुगली, उप तहसील लंबलू,
जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश
