शिमला में संविधान हत्या दिवस पर लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान, डॉ. राजीव बिंदल ने आपातकाल को बताया भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय

आपातकाल की विभीषिका को किया याद, भाजपा ने आयोजित की प्रदर्शनी व संगोष्ठी; लोकतंत्र सेनानियों और उनके परिजनों का हुआ सम्मान

संविधान हत्या दिवस पर भाजपा ने आपातकाल की विभीषिका को किया स्मरण, लोकतंत्र सेनानियों एवं उनके परिजनों का किया सम्मान

शिमला, 25 जून। भारतीय जनता पार्टी, हिमाचल प्रदेश द्वारा आज संविधान हत्या दिवस के अवसर पर शिमला में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर वर्ष 1975 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल की विभीषिका को स्मरण किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत मॉल रोड स्थित रोटरी टाउन हॉल के सामने आपातकाल पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने किया। प्रदर्शनी में आपातकाल के दौरान लोकतंत्र पर हुए हमले, प्रेस सेंसरशिप, लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष तथा ऐतिहासिक दस्तावेजों एवं चित्रों को प्रदर्शित किया गया।

इसके उपरांत कालीबाड़ी हॉल, शिमला में एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री श्री सुरेश भारद्वाज ने की। कार्यक्रम में वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान जेल गए लोकतंत्र सेनानियों एवं उनके परिजनों को सम्मानित कर उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया गया।

मुख्य वक्ता के रूप में अपने संबोधन में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। सत्ता बचाने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान की भावना का गला घोंटते हुए पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया। लाखों लोकतंत्र सेनानियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया गया।

उन्होंने कहा कि आज हम सौभाग्यशाली हैं कि 19 महीनों के लंबे संघर्ष के बाद देश में पुनः लोकतंत्र की स्थापना हुई। यह लोकतंत्र किसी सरकार की देन नहीं, बल्कि उन लाखों देशभक्तों के त्याग, तपस्या और संघर्ष का परिणाम है जिन्होंने जेलों में अमानवीय यातनाएं सहते हुए भी लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प नहीं छोड़ा।

डॉ. बिंदल ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान वे हरियाणा में विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता थे। भूमिगत रहकर लोकतंत्र बचाने के लिए साहित्य छापने और वितरित करने का कार्य किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार रात के अंधेरे में साइक्लोस्टाइल मशीन से पर्चे छापकर विश्वविद्यालयों और प्रभावशाली नागरिकों के घरों तक पहुंचाए जाते थे। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर करनाल जेल भेज दिया गया, जहां लगातार शारीरिक एवं मानसिक यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में तत्कालीन शासन के दौरान लोकतंत्र सेनानियों के साथ अत्यंत क्रूर व्यवहार किया गया। अनेक स्वयंसेवकों को उल्टा लटकाकर पीटा गया, चमड़े के चाबुकों से मारपीट की गई और झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा गया। कई लोगों ने जेल से बाहर आने के तुरंत बाद ही अपने प्राण त्याग दिए। उन्होंने कहा कि उस दौर की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है, उसे केवल वही महसूस कर सकता है जिसने उसे स्वयं झेला हो।

डॉ. बिंदल ने कहा कि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त कर दी गई थी। अखबारों पर सेंसरशिप लागू कर दी गई, बड़े-बड़े समाचार पत्रों के संपादकों और मालिकों को जेल में डाल दिया गया तथा रेडियो और अन्य संचार माध्यम पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में आ गए थे। उस समय सत्य को जनता तक पहुंचाने का कार्य भूमिगत कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना किया।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक पूजनीय बालासाहेब देवरस द्वारा जेल से भेजा गया एक छोटा-सा पत्र लाखों स्वयंसेवकों के लिए संजीवनी बन गया। उसी प्रेरणा से हजारों कार्यकर्ता भूमिगत रहकर संगठन को जीवित रखने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने कहा कि जेल जाने वाले कार्यकर्ताओं के साथ-साथ भूमिगत रहकर संगठन को जीवित रखने वाले कार्यकर्ताओं का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण था।

डॉ. बिंदल ने कहा कि यदि उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा लोकतंत्र सेनानियों ने संघर्ष न किया होता तो आज भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं होता। 1977 में जब चुनाव हुए तो जनता ने कांग्रेस सरकार को करारा जवाब देते हुए लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की और यह सिद्ध कर दिया कि भारत की जनता किसी भी तानाशाही को कभी स्वीकार नहीं करेगी।

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को आपातकाल के इतिहास से अवगत कराना समय की आवश्यकता है। लोकतंत्र और संविधान की रक्षा केवल कानूनों से नहीं बल्कि जागरूक नागरिकों से होती है। इसलिए आपातकाल की घटनाओं, लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष और उनके बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मंत्री श्री सुरेश भारद्वाज ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात था। उस कठिन समय में जिन लोगों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया, उनका योगदान सदैव देश के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान करना राष्ट्र के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भाजपा पदाधिकारी, कार्यकर्ता, प्रबुद्ध नागरिक, लोकतंत्र सेनानी एवं उनके परिजन उपस्थित रहे।

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