शिमला, 21 सितंबर। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करने और परियोजना का श्रेय लेने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना का समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों से संभव हुआ है। भाजपा इस परियोजना और समझौते का स्वागत करती है, लेकिन मुख्यमंत्री को इसके वास्तविक वित्तीय प्रावधानों और हिमाचल प्रदेश के दीर्घकालिक हितों की स्थिति जनता के सामने स्पष्ट करनी चाहिए।
डॉ. बिंदल ने कहा कि आज प्रदेश में एक पुरानी कहावत चरितार्थ हो रही है, जिसमें संसाधन किसी और के होते हैं और श्रेय कोई दूसरा लेने का प्रयास करता है। मुख्यमंत्री लगातार किशाऊ बांध परियोजना की उपलब्धियां गिना रहे हैं, लेकिन परियोजना के वास्तविक वित्तीय प्रावधानों और केंद्र सरकार के योगदान को सामने नहीं रख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर ही परियोजना की वास्तविक स्थिति प्रदेश की जनता के सामने रखना चाहते हैं।
₹15,624 करोड़ की परियोजना में केंद्र सरकार का सबसे बड़ा वित्तीय योगदान
डॉ. बिंदल ने कहा कि किशाऊ बांध परियोजना की कुल अनुमानित लागत ₹15,624 करोड़ है। इसमें जल घटक की लागत ₹12,096 करोड़ और विद्युत घटक की लागत ₹3,528 करोड़ निर्धारित की गई है।
उन्होंने कहा कि जल घटक की ₹12,096 करोड़ की राशि केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था इस परियोजना को आगे बढ़ाने का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
डॉ. बिंदल ने बताया कि इस परियोजना की परिकल्पना ब्रिटिश काल में हुई थी। वर्ष 1944-45 में इसका प्रारंभिक सर्वेक्षण हुआ, वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और वर्ष 1964 में प्राथमिक रिपोर्ट तैयार हुई। इसके बावजूद यह परियोजना दशकों तक आगे नहीं बढ़ सकी।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में भी परियोजना को लेकर बैठक हुई थी, लेकिन जल घटक की लागत के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई। छह लाभार्थी राज्य इस बड़े वित्तीय बोझ को वहन करने के लिए तैयार नहीं थे।
डॉ. बिंदल ने कहा कि वर्ष 2025 में केंद्र सरकार द्वारा जल घटक का खर्च वहन करने का सैद्धांतिक निर्णय परियोजना के लिए निर्णायक साबित हुआ। इसी के परिणामस्वरूप 15 सितंबर 2026 को छह राज्यों के बीच समझौता संभव हो पाया।
उन्होंने कहा कि विस्थापित परिवारों के पुनर्वास से संबंधित खर्च भी केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था है, जिससे हिमाचल सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।
बिंदल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों के लिए प्रदेश की जनता उनकी आभारी है। उन्होंने कहा कि रेणुका बांध सहित कई अंतरराज्यीय परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भी केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
₹1,764 करोड़ के निवेश और प्रदेश के जल अधिकारों का सवाल
बिंदल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों के लिए प्रदेश की जनता उनकी आभारी है। उन्होंने कहा कि रेणुका बांध सहित कई अंतरराज्यीय परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भी केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
₹1,764 करोड़ के निवेश और प्रदेश के जल अधिकारों का सवाल
डॉ. बिंदल ने कहा कि वर्ष 2015 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच विद्युत घटक की लागत को 50-50 प्रतिशत के अनुपात में वहन करने की सहमति बनी थी।
परियोजना के विद्युत घटक की कुल अनुमानित लागत ₹3,528 करोड़ है। इस व्यवस्था के अनुसार हिमाचल प्रदेश को ₹1,764 करोड़ का निवेश करना पड़ता।
उन्होंने कहा कि परियोजना की निर्धारित पूर्णता अवधि वर्ष 2040 तक बताई जा रही है। यदि निवेश को 13 वर्षों में विभाजित किया जाए, तो हिमाचल पर औसतन ₹135.69 करोड़ प्रतिवर्ष का वित्तीय दायित्व बनता है।
डॉ. बिंदल ने सवाल उठाया कि क्या हिमाचल प्रदेश अपने दीर्घकालिक जल अधिकारों और संभावित आर्थिक लाभों को सुरक्षित रखने के लिए यह निवेश नहीं कर सकता था?
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने तत्काल वित्तीय बोझ कम करने को प्राथमिकता दी, लेकिन भविष्य में जल संसाधनों से प्राप्त होने वाले लाभों का पर्याप्त मूल्यांकन जनता के सामने नहीं रखा।
उन्होंने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना के विद्युत घटक में निवेश न करने के निर्णय से हिमाचल को तत्काल कितना लाभ और भविष्य में कितना संभावित आर्थिक नुकसान होगा।
हिमाचल के लगभग 50 मिलियन क्यूबिक मीटर जल अधिकारों पर स्थिति स्पष्ट करे सरकार
डॉ. बिंदल ने कहा कि पूर्व निर्धारित जल बंटवारे के अनुसार हरियाणा की हिस्सेदारी 40.6 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश की 30.1 प्रतिशत, दिल्ली की 10.4 प्रतिशत, राजस्थान की 6.3 प्रतिशत तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की हिस्सेदारी 1.7-1.7 प्रतिशत थी।
उन्होंने दावा किया कि हिमाचल प्रदेश के हिस्से में लगभग 50 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी आता था, जिसके अधिकारों को लेकर नए समझौते में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं।
डॉ. बिंदल ने कहा कि उनके अनुसार हिमाचल के हिस्से की व्यवस्था में बदलाव के बदले दिल्ली और राजस्थान द्वारा क्रमशः लगभग ₹1,323 करोड़ और ₹441 करोड़ का वित्तीय योगदान प्रस्तावित है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या राज्य सरकार ने इस पानी के दीर्घकालिक आर्थिक मूल्य, भविष्य की सिंचाई आवश्यकताओं और पेयजल सुरक्षा का विस्तृत आकलन किया है?
उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जल अधिकारों में परिवर्तन स्थायी है या किसी निर्धारित अवधि के लिए है। भविष्य में हिमाचल की जरूरतें बढ़ने पर पानी प्राप्त करने की क्या व्यवस्था होगी?
डॉ. बिंदल ने कहा कि जल संसाधनों का मूल्य केवल वर्तमान वित्तीय योगदान से नहीं आंका जा सकता। आने वाले दशकों में कृषि, बागवानी, उद्योग और पेयजल की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री के ₹1,200 करोड़ वार्षिक आय के दावे पर उठाए सवाल
डॉ. बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं किशाऊ बांध परियोजना से हिमाचल प्रदेश को लगभग ₹1,200 करोड़ प्रतिवर्ष की आय होने का दावा कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री के इस अनुमान को आधार बनाया जाए और हिमाचल स्वयं विद्युत घटक में ₹1,764 करोड़ का निवेश करता, तो साधारण गणना के अनुसार लगभग डेढ़ वर्ष की आय इस निवेश के बराबर होती।
उन्होंने कहा कि ब्याज और अन्य वित्तीय दायित्वों को जोड़कर भी निवेश की वसूली की अवधि का विस्तृत आकलन किया जाना चाहिए।
डॉ. बिंदल ने सवाल उठाया कि यदि परियोजना से इतनी बड़ी वार्षिक आय की संभावना थी, तो सरकार ने स्वयं निवेश करने के विकल्प को क्यों छोड़ा?
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को ₹1,200 करोड़ की अनुमानित आय का आधार भी सार्वजनिक करना चाहिए। इसमें बिजली की बिक्री दर, हिमाचल को मिलने वाली बिजली की मात्रा, उत्पादन लागत और वास्तविक शुद्ध राजस्व का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
