26 जुलाई, 2026

ओडीएफ से सतत स्वच्छता की ओरः ग्रामीण स्वच्छता का नया अध्याय लिख रहा हिमाचल प्रदेश
नवाचार आधारित समाधान प्रशस्त कर रहे विकास की नई राह
7,000 से अधिक गांवों को मिला वैज्ञानिक स्वच्छता प्रबंधन का लाभ

खुले में शौच मुक्त होना स्वस्थ, स्वच्छ और सम्मानजनक समाज की आधारशिला है। स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए हिमाचल प्रदेश पहले ही खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) राज्य का दर्जा प्राप्त कर चुका है।अब राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता को और सुदृढ़ करने की दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण कदम उठा रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है कि स्वच्छता के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियां दीर्घकाल तक कायम रहें और उन्हें वैज्ञानिक तथा पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि राज्य में वैज्ञानिक फीकल स्लज मैनेजमेंट (एफएसएम) पहल को व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है। यह महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम प्रदेश के लगभग 7,000 गांवों को लाभान्वित करेगा तथा सेप्टिक टैंकों और एकल गड्ढा शौचालयों से निकलने वाले मल अपशिष्ट का सुरक्षित संग्रहण, परिवहन, उपचार और निस्तारण सुनिश्चित करेगा।
पिछले वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण और उपयोग को बढ़ावा देने में हिमाचल प्रदेश ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। अधिकांश ग्रामीण परिवारों तक शौचालय सुविधाएं पहुंच चुकी हैं। हालांकि, स्वच्छता केवल शौचालय निर्माण तक सीमित नहीं है। समय-समय पर सेप्टिक टैंकों और गड्ढों की सफाई तथा उनमें जमा होने वाले फीकल स्लज का सुरक्षित प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है।
यदि इस अपशिष्ट का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण न किया जाए तो यह जल स्रोतों, कृषि भूमि और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों को प्रदूषित कर सकता है। इससे डायरिया, हैजा और टायफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ने के साथ-साथ पेयजल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
पर्वतीय प्रदेश हिमाचल में प्राकृतिक जल स्रोतों, झरनों, खड्डों और नदियों का संरक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने ग्रामीण विकास विभाग और जल शक्ति विभाग के माध्यम से एक अभिनव एवं व्यवहारिक मॉडल अपनाया है।
राज्य सरकार ने अलग-अलग फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के बजाय सह-उपचार (को-ट्रीटमेंट) मॉडल को अपनाया है। इस मॉडल के अंतर्गत मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) का उपयोग फीकल स्लज के वैज्ञानिक उपचार के लिए किया जाएगा।
यह व्यवस्था हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, जहां सीमित भूमि, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और व्यापक वन क्षेत्र बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं। मौजूदा सुविधाओं का उपयोग करके राज्य सरकार संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर रही है, जिससे लागत में कमी आने के साथ पर्यावरणीय प्रभाव भी न्यूनतम होगा।
को-ट्रीटमेंट मॉडल के अंतर्गत चयनित एसटीपी में आवश्यक आधारभूत ढांचा विकसित किया जा रहा है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों से एकत्रित फीकल स्लज का वैज्ञानिक उपचार नगरों के सीवेज के साथ किया जाएगा। इससे अलग उपचार संयंत्रों की आवश्यकता नहीं होगी और अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण सुनिश्चित होगा।
परियोजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य स्तर पर एक अनुमोदन समिति का गठन किया गया है, जो उपचार क्षमता, अपशिष्ट उत्पादन के अनुमान और तकनीकी व्यवहार्यता का मूल्यांकन करने के बाद परियोजनाओं को स्वीकृत करेगी। अब तक प्रदेश में 30 को-ट्रीटमेंट परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है।
राज्य सरकार ने इस महत्त्वाकांक्षी पहल के लिए जल शक्ति विभाग को लगभग 15 करोड़ रुपये की राशि जारी की है। ग्रामीण विकास विभाग और जल शक्ति विभाग के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) ने विभागीय समन्वय को और मजबूत बनाया है तथा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाई है।
पालमपुर और सुंदरनगर में मौजूदा एसटीपी के साथ को-ट्रीटमेंट सुविधाओं के निर्माण कार्य शुरू हो चुके हैं और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को इसका लाभ मिलना भी प्रारंभ हो गया है। यह दर्शाता है कि सरकार की योजनाएं धरातल पर प्रभावी रूप से साकार हो रही हैं।

यह पहल हिमाचल प्रदेश की स्वच्छता यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। अब ध्यान केवल शौचालय निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण स्वच्छता श्रृंखला के सुरक्षित और सतत प्रबंधन पर केंद्रित किया जा रहा है। इससे ओडीएफ उपलब्धि को स्थायी बनाए रखने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जन स्वास्थ्य को भी नई मजबूती मिलेगी।
राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2027 तक सभी स्वीकृत को-ट्रीटमेंट परियोजनाओं को संचालित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इनके पूर्ण होने के बाद हजारों गांवों को वैज्ञानिक फीकल स्लज प्रबंधन सेवाएं उपलब्ध होंगी, जिससे जल स्रोतों का संरक्षण, ग्रामीण स्वच्छता में सुधार और पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ बनाने में सहायता मिलेगी।
ओडीएफ उपलब्धि से आगे बढ़ते हुए हिमाचल प्रदेश अब सतत स्वच्छता प्रबंधन की दिशा में एक नया मानक स्थापित कर रहा है। यह पहल न केवल ग्रामीण स्वच्छता की एक महत्त्वपूर्ण कमी को दूर करेगी, बल्कि यह भी दर्शाती है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नवाचार आधारित समाधान किस प्रकार विकास की नई राह प्रशस्त कर सकते हैं।
स्वच्छता के क्षेत्र में यह परिवर्तनकारी पहल एक स्वच्छ, स्वस्थ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल हिमाचल प्रदेश के निर्माण की दिशा में राज्य सरकार की दूरदर्शी सोच और प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है।
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जारीकर्ताः
निदेशक,
सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग
हिमाचल प्रदेश

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