हमीरपुर जनपद की सांस्कृतिक पहचान उसकी जीवंत लोकपरंपराओं में निहित है, और सुजानपुर टीहरा की होली इसी पहचान का सबसे उज्ज्वल उत्सव है। यह पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि इतिहास, लोकसंवेदना और सामाजिक समरसता का सजीव प्रतीक है। कटोच वंश की विरासत से समृद्ध सुजानपुर टीहरा में होली के रंग राजसी गरिमा और जनसामान्य की आत्मीयता को एक सूत्र में बाँध देते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप, लोकगीतों की गूंज और पारंपरिक नृत्य हमीरपुर की सांस्कृतिक आत्मा को मुखर स्वर प्रदान करते हैं। यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि हमारी परंपराएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की सांस्कृतिक पूँजी हैं। सुजानपुर टीहरा की होली—हमीरपुर की संस्कृति का रंगीन हस्ताक्षर है।जब बसंत की मादक बयार हिमालय की तराइयों को छूती हुई सुजानपुर टीहरा की गलियों में उतर आती है, तब यह ऐतिहासिक नगरी केवल ऋतु परिवर्तन का साक्ष्य नहीं बनती, बल्कि रंग, रस और राग से परिपूर्ण एक विराट उत्सवभूमि में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ मनाई जाने वाली होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों से बहती आ रही सांस्कृतिक चेतना का सजीव उत्सव है। सुजानपुर टीहरा—कटोच वंश की गौरवशाली विरासत को संजोए यह नगर—जब होली के रंगों से सजता है, तब इसके प्राचीन दुर्ग, मंदिर और चौक मानो इतिहास की गोद से उठकर वर्तमान में मुस्कुराने लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो समय स्वयं ठहरकर इस उत्सव का रसास्वादन कर रहा हो। सुजानपुर टीहरा की होली का स्वरूप राजाश्रय से पुष्पित-पल्लवित हुआ है। राजदरबारों में आरंभ हुआ यह उत्सव कालांतर में लोकजीवन में रच-बस गया। इसमें आज भी उस गरिमा की झलक मिलती है, जहाँ संस्कृति केवल प्रदर्शनी नहीं, बल्कि जीवनशैली हुआ करती थी। यह होली अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु की भाँति खड़ी दिखाई देती है।होली के दिनों में सुजानपुर टीहरा का प्रत्येक प्रांगण एक रंगमंच बन जाता है। ढोल-नगाड़ों की गूँज, बांसुरी की तान और लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ वातावरण को रसमय कर देती हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार जब मंच पर उतरते हैं, तो मानो लोकसंस्कृति स्वयं साकार हो उठती है। यहाँ की होली में रंग आँखों पर नहीं, सीधे मन और आत्मा पर चढ़ते हैं। हँसी, विनोद, व्यंग्य और श्रृंगार रस से भरी प्रस्तुतियाँ दर्शकों को अपने भीतर झाँकने पर विवश कर देती हैं। सुजानपुर टीहरा की होली सामाजिक एकता का उद्घोष है। इस दिन भेदभाव की दीवारें स्वतः ढह जाती हैं। अमीर-गरीब, वृद्ध-युवा, स्त्री-पुरुष—सभी एक ही रंग में रंगे दिखाई देते हैं। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसकी सहृदयता और सामूहिकता में निहित है। यह होली केवल उल्लास का क्षण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद की प्रक्रिया है। वरिष्ठ पीढ़ी अपने अनुभवों और परंपराओं के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है। लोकगीतों की पंक्तियों में इतिहास बोलता है और नृत्य की थाप पर भविष्य कदमताल करता है। आज सुजानपुर टीहरा की होली क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघकर व्यापक पहचान बना चुकी है। दूर-दराज़ से आने वाले पर्यटक यहाँ की सांस्कृतिक ऊष्मा को आत्मसात कर लौटते हैं। यह उत्सव न केवल सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करता है, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी नव ऊर्जा का संचार करता है। सुजानपुर टीहरा की होली जीवन का उत्सव है—जहाँ रंग केवल चेहरे पर नहीं, विचारों में घुलते हैं; जहाँ गीत केवल कानों में नहीं, आत्मा में उतरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि परंपरा जब संवेदना से जुड़ती है, तब वह केवल स्मृति नहीं रहती, बल्कि सांस्कृतिक विरासत बन जाती है। इसी विरासत का रंगीन, रसपूर्ण और गरिमामय स्वरूप है—सुजानपुर टीहरा की होली। लेखक:
राजन कुमार शर्मा
गांव व डाकघर डुगली,
उप-तहसील लंबलू
जिला हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश-177029
